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बुधवार, 29 अक्तूबर 2014

सबसे बडा गुनाह


शायद उसने किसी का कत्ल भी कर दिया होता तो भी उसका परिवार उसको माफ कर देता, मगर उसका गुनाह तो इससे भी कही बडा था । एक ऐसा गुनाह जो उसके परिवार को आज समाज में सम्मान से जीने का अधिकार नही देता। पिता के सारे जीवन की पूंजी उनकी दौलत नही बल्कि उनकी कमाई हुयी इज्जत ही तो थी, और आज उनकी बेटी ने उसको ही मिट्टी में मिला दिया था। वो तो कहो समय रहते उन्हे हर बात मालूम हो गयी, और समाज में उनकी नजरे झुकने से बच गयी।
आखिर क्या अधिकार था निमिषा को ऐसा करने का। हमेशा से ही तो वो घर में सबकी लाडली थी। मां    हो , पापा हो या भाई, सभी उसकी हर ख्वाइश को पूरा कर देते थे। भाई ने निमिषा के लिये पिता जी को शायद पहली बार जवाब दिया था- पापा निमिषा अब मेरी जिम्मेदारी है, आप प्लीज उसको पढने भेज दीजिये। मगर प्रह्लाद को भी क्या पता था जिस लाडली बहन के लिये वो पापा से उलझ रहा है, वही एक दिन सबके लिये उलझन बन जायगी।
और ऐसा नही था कि उनका नाज करना गलत था, हर जगह ही तो वो अव्वल आती थी। जब उसकी पढाई पूरी हुयी तो उसके पापा ही उसको होस्टल से लिवाने गये थे, वहां सभी के मुंह से निमिषा की तारीफ सुन कर उसके पापा का सीना खुशी से चौडा हो गया था। और उसी भरोसे पर उन्होने उसको नौकरी के लिये बाहर जाने की खुशी खुशी आज्ञा दे दी थी, मगर वो क्या जानते थे कि कल यही निमिषा उनके लिये अपमान का विषय बन जायगी।
शायद जो गुनाह निमिषा ने किया, उसके कितने भयानक परिणाम हो सकते है , उसके बारे में उसने भी अनुमान नही लगाया होगा, काश वो समय रहते सोच पाती कि वो जिस रास्ते पर चल रही है वो मात्र फिल्मों में ही अन्तोगत्वा सफल हो जाता है, हकीकत में नही। उसे क्या अधिकार था कि एक उच्च ब्राहमण कुल में जन्म लेने के बाद वो एक शूद्र से प्रेम करे। क्या हुआ जो किताबों मे लिखा गया है कि प्रेम की कोई जाति या धर्म नही होता। वो पगली क्यो नही समझ सकी कि प्रेम भी जातीय होता है, तो क्या हुआ जो उसका मानव लाखों में एक था, क्या हुआ जो मानव सहदय होने के साथ साथ एक सफल साइंटिस्ट भी था, तो क्या हुआ जो उसने कभी निमिषा की लंबाई या चेहरे के दागों पर ध्यान ना देते हुये उसके गुणों की कद्र की। आखिर क्यों वो मानव के हाथों में अपनी तकदीर देखती रही, कैसे उसे मानव के हाथों में नीच कुल की रेखा नही दिखाई दी जो उसके उच्च्कुलीन पिता के कुल के लिये ग्रहण से कम नही थी। आज वो चाहे स्वीकार करे या ना करे मगर गुनाह तो वो कर ही चुकी थी।
अब तो बस बाकी थी इस गुनाह का प्रायश्चित - जो शायद एक कुलीन ब्राहमण पुत्र के साथ अग्नि के सात फेरे लेकर अपने मन की आहुति उस अग्निकुंड में देने से ही उसे पूरा करना था।



11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (31.10.2014) को "धैर्य और सहनशीलता" (चर्चा अंक-1783)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. प्रेम की कोई जाति या धर्म नहीं होता
    तीखा व्यंग्य !

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  3. Bahut marmsparshi....wakayi prem ka jaativaad khatm nhi huaa duniya aage kitni hi nikal gyi to kyaa? Soch nhi badalni chaahe kuch bhi baadal jaaye... Umda prastuti !!

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  4. प्रेम से बडी कोई आहुति नहीं हो सकती.
    और सबा हमारे अहम की कुंठाएं हैं जो दूस्रों की बलि से ही शाम्त होती हैं.

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  5. अच्छी रचना !
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है !

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  6. समाज के मानदंड भी बड़े अजीब हैं !

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  7. ​बहुत मुश्किल होता है ये वास्तविक रूप में सह पाना ! पक्की बात है कि प्रेम की कोई जात नहीं होती किन्तु इंसान की तो जात होती है ​! और यही सब कुछ बिखेर देता है !

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