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गूगल अनुसरणकर्ता

रविवार, 23 जुलाई 2017

गिद्धीयनर



स्त्री को भी शायद ना पता हो
अपने उभार और ढलान का माप
मगर गिद्ध पुरुष की दॄष्टि
हमेशा नापती रहती है
अंग प्रत्यगं के बीच की दूरी
उसका क्षेत्रफल
और कभी कभी आयतन
कभी चौराहों पर
कभी कार्यस्थल पर
यहाँ तक की मन्दिर भी
आ जाते है चपेट में
ढके मुंदे तन में भी
ढूंढता रहता है
कोई खिडकी
जहाँ से दे सके उडान
अपनी वासना को
अपनी काम कल्पना में
उड कर भी
तॄप्त नही होती
कामाग्नि
चाहता है किसी भी तरह
उसे बुझाना
नही सोचता
क्या गुजरती है
स्त्री के कोमल हदय पर
जब भेदती है उसे
वक्री निगाहें
नही जानता
अपनी सोच मात्र से ही
हो चुका है पतित
और छल चुका है
अपनी अर्धागिंनी को
दिन भर की नाप जोख के बाद
जब बजाता है
घर की डोर बेल
निर्लाज्जता से
ओढ लेता है
थोडा दम्भ
झूठी थकान
झूठ्मूठ का प्यार
और दिखावटी जिम्मेदारी
क्योंकि
दरवाजे के खुलते ही
कोई कर रहा है इन्तजार
बना दिया है जिसने

उसे पति परमेश्वर

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

चालीस के पार


सुनो, मेरे पीछे
लापरवाही मत करना
मुझे पता है तुम
मेरा ख्याल रख सकते हो
मगर खुद का
बिल्कुल भी नही
हाँ आजकल भूलने बहुत लगे हो
याद से आ जाना समय पर
वरना तुम्हारे लिये
फिर सबसे झूठ बोलना पडेगा
और सुनने पडेगें जीजियों से ताने
काम तो बस तुम्हारे ही पति करते है
अरे हाँ एक और बात
रख कर जा रही हूँ
तुम्हारी स्टडी टेबल पर
चंद गुलाबी पन्ने
जिसे अब नही रखते तुम
मेज की दराज में
साथ में रख रही हूँ
कुछ गुलाब की पंखुडियां
कि जानती हूँ तुम्हे अब
कैक्टस का शौक है
अच्छा, ढूँढ सको तो ढूंढ लेना
वो रेनौल्ड का पेन
जिसमें अपने नाम की सिल्प
मैने डाल रखी थी
और एक दिन चुपके से
तुमने निकाल ली थी मेरे बस्ते से
आज चालीस पार फिर से मन
सोलह का हो रहा है
कब से आ चुका है जमाना
ई मेल और व्हाट्स अप का
और मन ले जा रहा है
मुझे पुराने दौर में
मुझे पता है बहुत व्यस्त हो तुम
अपने बिजी सेड्यूल में
फिर भी कर देते हो लाइक
मेरे फेसबुक मैसेज
शाम को जब बना रही होती हूँ चाय
तुम भेज रहे होते हो
मुझे जोक्स या मैसेज
फिर तुम चाय पीते हो
और मै करती हूँ रिप्लाई
सुनो, मै नही कहती
एक दिन में पूरा लिखो
थोडा थोडा सा लिखो
ना भेजो कुछ दिन
मुझे मैसेज
ना करो मुझे लाइक
एफ बी या टिव्टर पर
अच्छा पता याद तो है ना
तुम्हे अपनी ससुराल का
कि अब नही मिलेगी तुम्हे अनीता
जिसके हाथ भेज देते थे
खत में छुपा कर ढेर सारा प्यार
फिर से बन जाओ कुछ दिन के लिये
वही मेरे पुराने चन्दर
कि मै फिर से चाहती हूँ
तकिये के नीचे तुम्हे महसूस करना   
चाहती हूँ फिर से
सबसे नजर छुपाकर तुम्हे पढना
कि कबसे नही मिला मुझे
वो मेरा प्रेमी और उसका खत


* चित्र के लिये गूगल का आभार

गुरुवार, 20 जुलाई 2017

हर दौर का एक मकाम होता है..................


हर दौर की एक शख्सियत होती है
हर दौर का एक मकाम होता है

हर दौर की इक दास्तां होती है
हर दौर में कुछ नागवांर होता है
हर दौर में सौगातें मिला करती है
हर दौर बुलंद इमारतें छोड जाता है

हर दौर में मोहब्बत छुप के मिलती है
हर दौर में जमाना खिलाफ होता है
हर दौर मे शमां सिसक के जलती है
हर दौर में अवारा इश्क बागी होता है

हर दौर में जुबांने करवट लेती है
हर दौर कुछ लफ्जों से सजता है
हर दौर में शक्ल ए नज्म बदलती है
हर दौर का अपना तराना होता है

हर दौर की खट्टी मीठी यादें होती हैं
हर दौर कुछ कडवाहटें भी दे जाता है
हर दौर जब होता है बुरा लगता है
हर दौर बीत जाने पर याद आता है

हर दौर में कुछ फरमाइशें बन जाती है
हर दौर में कुछ हाथों से छूट ्जाता है
हर दौर में ख्वाइशें कमायत लाती है
हर दौर में नया हुनर ही रंग लाता है


हर दौर की एक शख्सियत होती है
हर दौर का एक मकाम होता है

बुधवार, 19 जुलाई 2017

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं.......................


कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
मुझे मुल्क से मोहब्बत नही
कि मै जुबां पर हिन्दी
दिल में उर्दू रखता हूँ

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
मुझे मजहब का इल्म नही
कि मै अपने घर में
गीता औ कुरान रखता हूँ

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
मुझे जीने का सऊर नही
कि मै राम औ रहमान में
कोई फर्क नही रखता हूँ

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
बन गया हूँ मै काफिर पूरा
कि मै आंगन में अपने
बकरी औ गाय रखता हूँ

कुछ लोग, कुछ लोग कहते हैं
न मिलेगी जन्नत मुझको
कि मै नाम औलाद का
कासिम नही कन्हाई रखता हूँ

मै भी कुछ कहता नही 
सिर्फ सुन लेता हूँ
नवाबी ढंग से जीता हूँ
पर लोगो का अदब रखता हूँ
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