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शनिवार, 30 दिसंबर 2017

जिन्दगी वादा है तुमसे नये वर्ष का

जिन्दगी
वादा है तुमसे,
इस वर्ष
नही दूंगी तेरी आंखों में आंसू
नही सिसकेगी तू चुपके चुपके
रात में तकिये के नीचे
नही मरेगी तिल तिल
किसी अत्याचारी के हाथ
नही होने दूंगी उदास
किसी वीरान कोने में चुपचाप
जिन्दगी रहूंगी
प्रतिपल तेरे ही साथ इस साल
बांटूंगी ढेरों खुशियां
ले चलूंगी तुझे 
उन लोगो के बीच
जो हार चुके है तुझसे
हम मिलक भरेंगे उनमें
उम्मीद की नयी रोशनी
जगायेगें उनमें
जीने का हुनर
जो जीते जी, जी रहे है
कभी घुट घुट कर कभी मर मर कर
तेरे साथ मिल कर करना है
मुझे एक यज्ञ
जिसमें दूंगी आहुति
अहंकार क्रोध और द्वेश की
जीतने को जीवन संग्राम
भस्म कर दूंगी
निराशा कुंठा और ईर्ष्या 
जो ले जाती हैं मुझे तुमसे दूर
जिन्दगी
वादा है तुमसे
दूंगी तुम्हे कुछ ऐसा इस साल
करेगी तू नाज
कभी खुद पर कभी मुझ पर
रहूंगी इस वर्ष
प्रतिपल तेरे ही साथ
हर सुख में हर दुख में
समरूपता से सम भाव से

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

अपने अपने कर्म या अपने अपने भाग्य

कॉलेज की सीढियां उतर रही थी, मेरे नीचे की सीढियों पर दो गर्भवती स्त्रियां थी- एक मेरे साथ की ही अध्यापिका थीं और दूसरी थी कॉलेज में काम करने वाली एक मजदूर औरत। एक सम्भल सम्भल कर उतर रही थी, तो दूसरी अपने सिर पर रखी मौरंग की बोरी को ज्यादा सम्भाल कर उतर रही थी या अपने गर्भ में पल रही संतान को कहना मुश्किल था। एक बच्चे को भरपूर फल जूस और मेवे मिल रहे थे और दूसरे को सिर्फ माँ का रक्त। तभी सुबह पढी रामायण की चौपाई याद आ गयी
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करई सो तसि फल चाखा।
मन में एक अजीब सा द्वन्द होने लगा। कौन सा कर्म किया है अलग अलग गर्भ में पल रही संतानों ने। क्या एक जन्म में ये मजदूर की संतान भर पायेगी इस भाग्य की खाई को?
और सोचने लगी कर्म बडा या भाग्य

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

कागज की टीस

लैपटाप पर करते करते काम
एकदिन अचानक
आया मुझे याद  
लिखना कागज पर
बैठ गया लेकर
अपना फेवरेट
पुराना लेटर पैड 
और बॉलपेन
जिसके पीले पन्ने
दे रहे थे गवाही
मेरे और उसके
रिश्ते की उम्र की
लिखना
शुरु भी न किया
विचारों का तूफान
हिलाने लगा मस्तिष्क को
नाना प्रकार के ख्याल
घेरने लगे मन को
तभी कानों में आयी
करुण आवाज
इधर उधर देखा
कही किसी को न पाया
सोचा लगता हुयी कोई शंका
बनाने लगा
कोई शेर गजल या कविता
जैसे ही कलम ने
स्पर्श कागज का पाया
फिर से ठ्हरों का स्वर
कानों से टकराया
मै हूँ तुम्हारे लेटर पैड का
पीला पड गया पन्ना
कर ही दी तुमने आज पूरी
मेरी अधूरी तमन्ना
चाह रहा हूँ करना
मित्र तुम्हारा धन्यवाद
अरसे बाद की सही
आयी तो तुम्हे मेरी याद
हर दीवाली जब करते थे तुम
अलमारी की सफाई
मुझे लगता था इस बार तो
मेरी शामत आई
करने लगता था कोशिश छुपने की
किताबों के बीच
डरता था बेंच न दो 
कबाड के बीच
किन्तु मुझ पर जमी धूल
पोंछ कर कुछ सोच कर
जब रख देते थे रैक में
इतरा जाता था झूम कर
तुम्हारी गोद में रखा लैपटाप
हर दिन मुझे चिढाता था
मुझे जलन नही होती
बस खुद पर खेद हो जाता था
कि नही हूँ मैं गतिमान
आधुनिक तकनीक सा
सामर्थ्य भी है सीमित
विस्तॄत भी नही नोट्पैड सा
फिर भी करता हूँ तुमसे
छोटा सा निवेदन
तोडना न कभी
मुझसे अपना बन्धन
चाहे लिखना
पीड़ा मन की
या लिख लेना
याद भूली बिसरी 
चाहे जितना
मुझे काटना 
या मिटाना
मगर
न फेंकना फाड कर
किसी कूडेदान में
बस रख देना सहेज कर
पुनः किताबों के बीच में
यदि सम्भव हो तो मान लेना
मेरी छोटी सी विनती
यूं ही दिखा दिया करो
यदा कदा धूप हवा रोशनी
क्षीण होते शरीर में
आ जायगी कुछ श्वांस
जी उठेगा मुझमें भी
जीवित होने का अहसास
देता हूँ मै भी तुम्हे ये वचन
भले वक्त के कारन
पड जाऊँ धुंधला
किन्तु शब्दों के साथ
सहेजे रहूंगा 
वो सारे अहसास
जो बांटोंगे आज
लिखते लिखते मेरे साथ

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

मै और मेरा वक्त


देखा है
वक्त को
सावन सा बरसते
कभी बूँद बूँद रिसते हुये
देखा है
वक्त को
बच्चे सा भागते
कभी हांफते कदमों से रेंगते हुये
देखा है 
वक्त को
रेत सा फिसलते
कभी बर्फ सा पिघलते हुये
देखा है
वक्त को
नॄतकी सा थिरकते
कभी गुमसुम सुबकते हुये
देखा है 
वक्त को
प्रेमी सा रूठते 
कभी प्रियतम सा उपहार देते हुये
देखा है
वक्त को
साथ साथ चलते
अपना हिस्सा बनते हुये

वो वक्त ही तो है
जो रोया था मेरे साथ
और मेरी हंसी पर हंसा था
वो वक्त ही तो है
जब कोई न था मेरे साथ
तब भी मेरे आस पास था
वो वक्त ही तो है
जो तब भी न गया छोड के मुझे
जब कहा इसे भला बुरा
वो वक्त ही तो है
जिसे कोसने मगर उसने दिया
मुझे विश्वास, हौसला जीने का
वो वक्त ही तो है
जो जन्मा है मेरे साथ
जो छोड देगा जहाँ मेरे साथ 
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